Wednesday, 13 February 2013

MY COMMUNITY PROJECT.


MY PRIVATE PROJECT









बुरे और अच्छे दौर की अपनी खूबियाँ और खामियां होती है। Fellowship भी मेरे लिए बुरे और अच्छे दौर का सयुंक्त मिश्रण है। Private Project, Fellowship का एक  छोटा किन्तु महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक है। Fellowship के इस हिस्से को पूरा करने के क्रम में मैंने कई उतार - चढ़ाव देखे। खुशियाँ- गमचुनोतियाँ- सफलता और गंभीरता के अलग- अलग पैमाने से होकर गुजरा है मेरा Private Project.
                                                                                        
                       इसकी सफलता की वास्तविकता उतनी सरल नहीं है, जितनी प्रतीत होती है। Project को सफ़लता और सहजता से समाप्त करने हतु टीम ने  जो जद्दो-जहद की है, उसे शब्दों में वर्णित करना कठिन है, फिर भी  मैंने आप सभी के सामने  गागर में सागर भरते हुए  इसे प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। 

Name – MOHAMMAD ALI                   
Project -  Best utilization of Old Cloths.               
Location – Chapar (Sujangarh)

             मैंने अपने प्रोजेक्ट की शुरुआत दिलचस्पी से नहीं बल्कि जिम्मेदारी से की थी। उस वक़्त मैं Fellowship के बुरे दौर से गुजर रहा था। Organization द्वारा सौंपा गया यह कार्य  मेरे लिए जिम्मेदारी से कह़ी  बढ़ कर चेतावनी के रूप में था। Fellowship में अपनी स्थिरता बनाए रखने के लिए, इस Project को सफल बनाना मेरे लिए आवश्यक ही नहीं  बल्कि नितांत  आवश्यक हो गया था। Fellowship में अपनी पहचान बनाये रखने, आत्म- सम्मान की वापसी और एक बार फिर से खुद को साबित करने का इससे बेहतर मौका  दूसरा नहीं हो सकता था। यह सच है की - भाग्य भी बहादुरों का ही साथ देती है। फिर मेरे साथ तो सुजानगढ़ block के अमूल्य साथियों का प्रत्यक्ष साथ और विभिन्न ब्लाक के साथियों का अप्रत्यक्ष साथ भी था। 

             मैंने इस Project की रूप - रेखा को  मुख्यतः तीन चरणों में विभाजित किया था।

प्रथम --- समुदाय से पुराने  कपड़े इकठ्ठा करना

दूसरा --  इकठ्ठा कपड़ों को छांटना, बिलकुल फटे कपड़ों से दरियाँ बनवाना, योग्य कपड़ों
को मरम्मत करवा कर उसे साफ़ करवाना और बेहतर  रूप देकर नए पन्नी
               में पैक करना।

तीसरा -- निश्चित दिन तय करके समुदाय के लोगों से सफाई करवाना और जरुरतमंदों
              को गर्म कपड़े , साड़ी, एवम दरी वितरण करना इसके अतिरिक्त सफाई और
              स्वछता को लेकर समुदाय के लोगों में जागरूकता लाने की कोशिश करना।

               विचार के स्तर पर कार्यक्रम की शुरुआत तो दिसम्बर माह के प्रथम दिन से ही हो गयी थी , परन्तु क्रियान्वन की दृष्टिकोण से  इसकी शुरुआत 26  दिसम्बर 2012 से हुई। अंतिम तिथि 14 जनवरी 2013 तय की गयी। अतः मैं और मेरी टीम के पास कुछ करने  ही नहीं बल्कि सोचने के लिए भी वक़्त की कमी महसूस हो रही थी 

               26 दिसम्बर को समुदाय के लोगों के साथ प्रथम  बैठक संपन्न किया। जिसमे अपने प्रोजेक्ट को विस्तृत रूप से समझाया। उस बैठक में समुदाय के वे  लोग भी शामिल थे , जिन्हे Project के बारे में मैंने पहले ही समझा दिया था। इस बैठक में मेरे साथ सुजानगढ़  के  2 और Fellow भी थे।  पहली  बैठक की सफलता ने मुझमे उत्साह और उमंग भर दिया। समुदाय के लोगों द्वारा  किया गया भरोसा इस Project को और गति प्रदान करता चला गया। 

              अगली बैठक से पहले मैंने FlaxBanner  और Pamphlets  छपवा लिए और समुदाय के लोगों ने अपने स्तर पर इसका प्रचार  प्रसार कर दिया था हमारी अगली meeting छापर के प्रधान तथा समुदाय के महत्वपूर्ण लोगों के साथ हुई। इस बैठक में कुछ चीज़े तय हुई -- 
1. (एक) अज्ञात व्यक्ति का  सम्पूर्ण प्रोजेक्ट को  आर्थिक सहयोग देना। 
2. कपड़े इकठ्ठा करने का दिन  एवं  स्थान निश्चित हो जाना। 
3. समूह के सभी सदस्यों के बीच  छोटे - बड़े  सभी कार्यों का विभाजन कर उन्हें जिम्मेदारी
    के  साथ सौंपना। 
4. प्रचार - प्रसार हेतु मंदिरों में लगे माइक का उपयाग करना और इकठ्ठा करने वाली
    गाड़ी का इन्तेजाम करना। 

                  पहले चरण की शुरुआत 29 दिसम्बर 2012 को हुई। हाथ में  माइक लिए,  जीप में सवार  सुजानगढ़ टीम के सदस्य तथा समुदाय के लोगों  का जोश  देखते बन रहा था। पहले दिन हमने सफलतापूर्वक 1 जीप  पुराने  कपड़े इकठ्ठा किए। दुसरे दिन फेलो  की संख्या  क्या बढ़ी,  इकठ्ठा किए गए कपड़ों  की मात्रा भी  तीन गुनी हो गयी। दुसरे दिन रविवार को रतनगढ़, चुरू और तारानगर के फेलो  भी हमारे साथ थे।  

                    पहले कड़ी की समाप्ति के पश्चात हमने बिना विलम्ब किए आगे की कार्यवाही शुरू कर दी। हाँ , इस गहमा- गहमी में नया  साल मानना नहीं भूले। 1 जनवरी को समुदाय में ही रात्रि  का  भोजन राजस्थानी अंदाज़ में किया और आगे की योजना बनाई। 
  
                   नये साल की ख़ुशी में हम यह भूल गए थे कि प्रोजेक्ट पूरा करने के क्रम में समस्याएं  भी आती है। परन्तु यह बात मैं ज्यादा  देर तक नहीं भूल पाया क्यूंकि समस्या मुंह बाए सामने खड़ी थी। 

                  समुदाय के लोगों से अगले (दुसरे) और तीसरे चरण को लेकर बात की तो पता चला की समुदाय के उच्च वर्ग का एक भी  आदमी सफाई कार्यक्रम में हमारा साथ नहीं देगा, क्योंकि वहां निम्न वर्ग के लोग भी मौजूद होंगे। काफी समझ बनाने के बावजूद  भी एक व्यक्ति ने स्वीकृति में अपना सर नहीं हिलाया। उस प्रस्थिति में मेरे चारों ओर निराशा के बादल मंडराने  लगे और मुझे  एक  ही डायलोग याद आ रहा था की --- " जाति वो पारम्परिक कीड़ा है जो मानव मस्तिष्क से तो चली जाए, पर दिल से नहीं जाती।।"
     
                काफी वैचारिक तर्क - वितर्क एवं बहस के पश्चात अंततः समुदाय के वे लोग जो हमारी टीम के सदस्य हैं , हमारा साथ देने के लिए तैयार हो गए। मैं आज भी इस बात को समझता हूँ की उनकी रजामंदी  हमारी बौद्धिक बहस से नहीं बल्कि, हमारे विश्वास से हुई  है। ये मेरी  हार थी या जीत मुझे नहीं पता, और उस वक़्त ये सब पता करने का वक़्त  भी नहीं था मरे  पास 

                खैर, दुसरे चरण की शुरुआत 3 जनवरी से हुई। मैं एक समस्या से ठीक से निकल भी नहीं पाया था कि दूसरी समस्या सामने  खड़ी थी। इतने सारे कपड़ों  को कहाँ धुलवाएँ ??? सुजानगढ़ में 1 गर्म कपड़े को धोबी से धुलवाने की कीमत 40 रुपये थी और हमारे पास लगभग 200 कपड़े थे।  इस  समस्या पर  हमारी टीम से जुड़ा समुदाय के 1 व्यक्ति ने कहा -- " अरे, ये डोम - दुसाद गरीब लोग है,  इन्हे गन्दा या फटा  जैसा भी दे दो, तुम्हे भगवान् समझ कर ले लेंगे। उसी वक़्त मैने फैसला किया कि - प्रोजेक्ट हो या न हो कपड़े तो धुल कर और  साफ़ हो कर ही बाँटे जाएंगे, चाहे सारे कपड़े मुझे अकेले ही क्यों न धोना पड़े।      

                  ऐसी प्रस्थिति में मैंने अपनी टीम का सहयोग लेते हुए  यह निर्णय लिया कि कपड़े ब्लॉक में ही धुलेंगे। 2 बाहरी लड़के जो पेशे  से धोबी थे और सुजानगढ़ ब्लॉक के सभी Fellows की मदद से सारे कपड़े धुले भी , सुखे भी और बेहतरीन तरीके से पैक भी हो गए।

                   सब - कुछ सकारात्मकता से होते  हुए देख  मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि  -- सच में साथ हो तो ऐसा वरना ना हो।  इस टीम वर्क ने हमारे बीच विश्वास और घनिष्टता को और मज़बूत बनाया। अब दो फेलो के बीच का झगड़ा पति - पत्नी के आपसी  अनबन से ज्यादा कुछ नही लगता।

         दरियाँ बनवाने का कार्य भी इसी चरण में था, जो कि कम मुश्किलों से भरा नहीं था। 1 दरी बनवाने की कीमत -- 4 kg फटे कपड़े और Rs. 100 थी।   इतने कम समय में हमने 263 फटे कपड़ों से कुल 65 दरियाँ बनवाई। 3 से 13 जनवरी के अन्तराल में हमने उपर्युक्त सफलता पाते  हुए वितरण करने हतु काफी कुछ इकठ्ठा कर लिया था। जिसकी  सूची निम्न है ----
1. साड़ी - 115.                          2. दरिया -- 65  
3. कम्बल -- 45                                   4.गर्म कपड़े -- 200 (लगभग)

                    14 जनवरी को बाँटे जाने वाले कपड़ों के अतिरिक्त हमारे पास -- लगभग - 200 शर्ट , 250 पैंट , 200 सलवार सूट और तक़रीबन 600 बच्चे और बच्चियों के कपड़े बच  गए थे। इन बचे कपड़ों का क्या करना है यह सोंचने के बजाए , हमारे टीम ने तीसरे और अंतिम चरण पर ध्यान दिया। 
               
          तीसरे चरण के आरम्भ से पूर्व संध्या एक बैठक में हम यह निश्चित कर चुके थे कि कौन - कौन से स्थान की सफाई  करनी है। इस कार्य में हमारा साथ प्रधान और नगर निगम के कर्मचारियों ने दिया। हमने प्रधान की सहायता से  नगर निगम के पुरुष और महिला कर्मचारियों को भी अपने "सफाई अभियान" में जोड़ लिया। कपड़े वितरण करने हतु स्थान का चयन किया। कार्यक्रम की शुरुआत प्रधान एवम अंत शिक्षा के अधिकारी द्वारा करवाने  की रूप - रेखा तैयार करते हुए निमंत्रण पत्र की एक - एक प्रति शिक्षा अधिकारी, तहसीलदार, आर-पी , एवम  अन्य अधिकारियों  तक पंहुचा चुके थे। 

           हर रोज़ की तरह 14 जनवरी की कपकपाती सुबह ही गयी, जो अन्य के लिए पता नही, परन्तु मेरे लिए बहुत खास होने वाली थी। नियत समय पर  मैं अपनी टीम के साथ छापर पहुँच चुका था। गर्मा - गरम चाय से स्वागत पाने के बाद हम सबने प्रधान की अध्यक्षता में "सफाई अभियान" शुरू किया। देखते ही देखते धूल भरी सड़के राजमार्ग जैसी प्रतीत होने लगी। होती भी क्यों नही, हमारी संख्या जो तक़रीबन 100 के करीब थी। आम  लोगों से मिलने  वाला प्रोत्साहन और सहयोग तारीफ  के काबिल था।
                      सफाई के पश्चात हमने जरुरतमंदो में  गर्म  कपड़े , साड़ियाँ , दरी और कम्बल का वितरण किया और लोगों को साफ़सफाई  रखने के तरीके पर चर्चा की। गाँव में चल रहे सरकारी कामों की व्यस्तता के कारण सरकारी अधिकारी हमारे कार्यक्रम में शामिल नही हो सके। परन्तु समुदाय की भीड़ और उत्साह ने इसकी कमी महसूस  होने दिया।   हमने चिंगारी लगा कर जो शुरुआत की थी, अब तक वो आग का रूप धारण कर चुका था। लोगों द्वारा मिलने वाली शाबाशी  इसको स्पष्ट दर्शा  रही थी। समुदाय के लोगों  ने इस कार्य को हर साल करने का निर्णय लिया और मंदिर के प्रांगण में एक  बड़ा कमरा निश्चित किया है, जहा साल भर कोई भी व्यक्ति अपने फटे - पुराने कपड़े जमा करवा सकता है। 

              सफलता की मुस्कराहट लिए, आकाश में रंग - बिरंगे पतंग देखते हुए मैं भी अपनी टीम के साथ वापस गया। बचे हुए कपड़ों का अम्बार आज धीरेधीरे समाप्त हो रहा है। ख़ुशी की बात यह है की इन कपड़ों को सड़क के किनारे बसने वाले बंजारों तक पंहुचाया जा रहा है।

 अंत में 1 पंक्ति कह कर अपने सफ़र को विराम दे रहा हूँ कि ---- 

 " यदि तुम उपयोगी हो तो, कोई तुम्हारी उपेक्षा नही कर सकता।। " "

धन्यवाद
आपका प्रिय,
मोहम्मद अली
पिरमल फेलो -- 4
सुजानगढ़ , चुरू


                        

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